DPDP Compliance

13 मई 2027 से ये क़ानून बन जाता है। और शिकायत सुनने वाला बोर्ड अभी से चालू है।

आपके फ़ोन में हज़ारों ग्राहकों के नाम और नंबर हैं। वो आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है — और अब क़ानून की नज़र में आपकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी भी। हम काग़ज़ नहीं बेचते; डेटा आने का रास्ता ठीक करते हैं।

from ₹50,000 + GST

डेमो

DPDP COMPLIANCE

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13 MAY 2027 — POORI TARAH LAAGU. KOI CHHOOT NAHI.

JURMANA — kanoon mein likha hua

Data theek se na sambhalna, aur chori ho jaana
₹250 crore tak
Chori hone par logon ko aur Board ko na batana
₹200 crore tak
Bachchon ka data galat tarah se rakhna
₹200 crore tak
Baaki niyam na maanna
₹50 crore tak

Aur yeh judte hain. Ek hi gadbad mein teen alag jurmane lag sakte hain — data na sambhalna, na batana, aur Board ko na batana. Teenon alag-alag.

PAR SEEDHI BAAT — aapke naap ka sach

Aap par ₹250 crore nahi lagega. Woh number badi companiyon ke liye hai, aur Board jurmana gadbad ke naap ke hisaab se tay karta hai.

Aapke saath jo hoga woh yeh hai: ek shikayat, ek jaanch, aur woh kagaz maange jaayenge jo aapke paas hain hi nahi. Us jaanch mein vakeel ka kharcha, waqt, aur naam — teenon jaate hain, jurmana lage ya na lage.

Aur doosri cheez usse pehle aayegi: badi companiyaan aur tender aapse yeh kagaz maangne lagenge. Woh May 2027 ka intezaar nahi karte.

Ek aam dukaan meinDATA KAHAN-KAHAN PADA HAI
 

 

Yeh zaroori kyun hai

Kanoon ki baat baad mein. Pehle yeh dekhiye ki hota kya hai.

Teen halat. Teenon aam hain. Har ek mein do raaste dikhte hain — taiyaar na hone par, aur taiyaar hone par.

Hum kya karte hain

Vakeel kagaz deta hai. Hum data ka raasta badalte hain.

TEMPLATE PDF
VAKEEL
HUM
Kisi aur ki site se copy
Aapke liye likha hua kagaz
Kagaz + data ka raasta theek
Kaam karne ka tareeka wahi
Salah milti hai, kaam aapko karna hai
Website, WhatsApp, form — hum khud badalte hain
Grahak poochhe toh koi jawab nahi
Har baar poochhna padta hai
Ek tareeka, jo aapka staff bhi chala sake
Shikayat par kaam nahi aata
Kaam aata hai, par mehnga
Kaam aata hai, aur record pehle se taiyaar

Hum vakeel nahi hain, aur na hone ka daava karte hain. Kanooni raay chahiye toh vakeel hi chahiye — aur woh mod aane par hum khud bol denge. Hamara kaam alag hai: data aata kaise hai, rakha kaise jaata hai, aur mitta kaise hai.

Hum hi kyun

Kyunki jahan data aata hai, woh cheez hum banate hain.

Website ka form hamara banaya hua hota hai

Ijaazat wahin lagti hai jahan naam-number andar aata hai. Baad mein chipkane wali cheez nahi hai.

WhatsApp ka raasta bhi hum jaante hain

Zyadatar dhandhon mein data WhatsApp se aata hai. Vakeel us jagah tak pahunchta hi nahi.

Kagaz aur code, ek hi jagah

Notice likhna aur uska asal mein lagna — do alag kaam hain. Do alag logon se karwane mein hi cheezein chhoot jaati hain.

Taareekh pehle likhi jaati hai

Har hissa kab milega, likh ke. Der hui toh woh kaam free. Baaki jagah yeh kaam mahino kheenchta hai.

Saath mein yeh bhi chalta hai

Ek baar ka kaam — mahine ka bill nahi

क्या यह कहानी जानी-पहचानी है?

  • दस हज़ार नंबर एक एक्सेल में, एक लैपटॉप में, एक दुकान में — और उस पर पासवर्ड तक नहीं।
  • आप हर उस ग्राहक को ऑफ़र भेजते हैं जिसने कभी ख़रीदा। किसी ने कभी हाँ नहीं कहा था।
  • एक बड़ी कंपनी ने डेटा सुरक्षा का फ़ॉर्म भेजा और आपको पता ही नहीं कि उसका जवाब क्या दें।
  • आपकी साइट का फ़ॉर्म नाम-नंबर लेता है, और पन्ने पर कहीं नहीं लिखा कि उनका होता क्या है।

यह आपके लिए है, अगर

  • आप नाम, नंबर, पता या सेहत की जानकारी रखते हैं — यानी लगभग हर कारोबार।
  • आप WhatsApp मार्केटिंग करते हैं, ग्राहकों की सूची रखते हैं, या साइट पर फ़ॉर्म है।
  • बड़ी कंपनियाँ या टेंडर आपसे डेटा सुरक्षा के सवाल पूछने लगे हैं।
  • आप शिकायत आने के बाद के बजाय अभी चुपचाप निपटा लेना चाहते हैं।

यह आपके लिए नहीं है, अगर

  • आपको साइट पर चिपकाने के लिए एक PDF चाहिए। वो अनुपालन नहीं, सजावट है।
  • आपको फ़्रेम कराने लायक़ प्रमाणपत्र चाहिए। ऐसा कुछ होता ही नहीं — ये इस बात का काम है कि डेटा असल में सँभाला कैसे जाता है।

काम कैसे होता है

  1. 1

    पता करते हैं डेटा है कहाँ

    फ़ोन के कॉन्टैक्ट, एक्सेल, बिलिंग सॉफ़्टवेयर, साइट का फ़ॉर्म, CCTV, WhatsApp। ज़्यादातर लोग ये सूची देख कर चौंक जाते हैं।

  2. 2

    जहाँ डेटा आता है वहाँ सुधार

    साइट, WhatsApp, दुकान का फ़ॉर्म — हर जगह इजाज़त सही तरीक़े से ली जाए, आपके ग्राहक की भाषा में।

  3. 3

    आपके कारोबार के हिसाब से काग़ज़

    प्राइवेसी नोटिस, इजाज़त का टेक्स्ट, कितने दिन डेटा रखना है, और गड़बड़ होने पर क्या करना है। किसी और की साइट से कॉपी किया हुआ नहीं।

  4. 4

    रोज़मर्रा का तरीक़ा

    कोई अपना डेटा माँगे या मिटाने को कहे तो क्या करना है — इतना साफ़ कि आपका कोई भी कर्मचारी कर सके।

हाथ में क्या आएगा

  • साफ़ तस्वीर कि आपके कारोबार में कौन सा निजी डेटा कहाँ पड़ा है।
  • हर उस जगह इजाज़त ठीक जहाँ डेटा अंदर आता है — साइट, WhatsApp, फ़ॉर्म, आमने-सामने।
  • आपके कारोबार के लिए लिखा प्राइवेसी नोटिस, आपके ग्राहकों की भाषा में।
  • कितने दिन रखना और कब मिटाना — ताकि आप बेवजह डेटा ढोना बंद करें।
  • डेटा माँग और शिकायत सँभालने का आसान तरीक़ा।
  • एक छोटा दस्तावेज़ जो आप किसी भी बड़े क्लाइंट को दे सकें।

टेम्पलेट PDF बनाम वकील बनाम हम

किसी और की साइट से कॉपी
काग़ज़ के साथ डेटा का रास्ता भी ठीक
काम करने का तरीक़ा वही रहता है
साइट, WhatsApp, फ़ॉर्म — हम ख़ुद बदलते हैं
ग्राहक पूछे तो कोई जवाब नहीं
एक तरीक़ा, जो आपका कर्मचारी भी चला सके
शिकायत पर काम नहीं आता
काम आता है, और रिकॉर्ड पहले से तैयार

वक़्त पर, वरना फ्री।

हर हिस्से — डेटा का नक़्शा, दस्तावेज़, सेटअप — की तारीख़ पैसे लेने से पहले तय होती है। देर हुई तो वो हिस्सा मुफ़्त। ये वादा नहीं करेंगे कि आप पर कभी शिकायत नहीं होगी; जो ऐसा कहे उसे क़ानून समझ ही नहीं आया।

अनुपालन, बिना काग़ज़ी कारोबार बने।

  • आप एक साफ़ जोखिम ढोना बंद कर देते हैं जो हर नए ग्राहक के साथ बढ़ता है।
  • बड़े क्लाइंट और टेंडर उन सवालों पर अटकना बंद कर देते हैं जिनका जवाब आपके पास नहीं था।
  • WhatsApp मार्केटिंग को सही आधार मिल जाता है, ताकि वो देनदारी न बने।
  • आप कम डेटा रखते हैं — यानी खोने को कम और चिंता भी कम।
  • ग्राहक को दिखता है कि आप उनकी जानकारी को गंभीरता से लेते हैं।
  • आपके नाप का काम — दुकान को बैंक की तरह नहीं आँका जाता।

आपके सवाल

क्या ये सच में छोटे कारोबार पर भी लागू है?

हाँ। क़ानून इस पर लागू होता है कि आप निजी डेटा रखते हैं या नहीं, आपके टर्नओवर पर नहीं। छोटे कारोबारों को कुछ आसान शर्तें मिलती हैं, छूट नहीं।

जुर्माना कितना है?

क़ानून में सुरक्षा में चूक पर ₹250 करोड़ तक और चोरी न बताने पर ₹200 करोड़ तक का प्रावधान है, और ये अलग-अलग जुड़ भी सकते हैं। पर सीधी बात: आप पर ₹250 करोड़ नहीं लगेगा — वो बड़ी कंपनियों के लिए है। आपके साथ जो होगा वो ये है — एक शिकायत, एक जाँच, और वो काग़ज़ माँगे जाएँगे जो आपके पास हैं ही नहीं।

क्या आप वकील हैं?

नहीं, और ये साफ़ कह देते हैं। हम व्यावहारिक काम करते हैं — डेटा का नक़्शा, इजाज़त, नोटिस, तरीक़ा, तकनीकी सुधार। किसी विवाद पर क़ानूनी राय के लिए वकील चाहिए, और वो मोड़ आने पर हम ख़ुद बता देंगे।

क्या इससे मेरी WhatsApp मार्केटिंग बंद हो जाएगी?

नहीं, पर इजाज़त लेने का तरीक़ा बदलेगा ताकि वो टिके। जो लोग सच में हाँ कहते हैं, उन पर मार्केटिंग चलती भी बेहतर है।

कितना समय लगता है?

ज़्यादातर छोटे कारोबारों के लिए दो से चार हफ़्ते। सेहत या बच्चों का डेटा हो तो ज़्यादा, क्योंकि वहाँ शर्तें सख़्त हैं।

क्या ये एक बार का काम है?

सेटअप एक बार का है। कारोबार बदले — नए सिस्टम, नया डेटा — तो दोबारा देखना पड़ता है। कब, ये हम बता देंगे; महीने की फ़ीस पर नहीं डालेंगे।

फ़ोन में पड़ा डेटाबेस उस दिन तक संपत्ति है, जिस दिन वो देनदारी बन जाए।

उस दिन की कोई घोषणा नहीं होती। वो एक शिकायत के रूप में आता है, या एक बड़े क्लाइंट के फ़ॉर्म के रूप में, या एक खोए हुए लैपटॉप के रूप में। इसे ठीक करने में कुछ हफ़्ते लगते हैं, और फिर ये सोचने की चीज़ नहीं रहती।

from ₹50,000 + GST